विदेश मंत्री का 72वें संयुक्त राष्ट्र आम सभा में भाषण

न्यूयॉर्क: विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने न्यूयार्क में चल रहे संयुक्त राष्ट्र आम सभा के 72वें अधिवेशन के दौरान पूरजोर तरीके से पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा। संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण में सुषमा स्वराज ने कहा, ‘सबसे पहले तो संयुक्त राष्ट्र महासभा के 72वें सत्र के सभापति चुने जाने के लिए मैं आपको हृदय से बधाई देती हूं। हमारे लिए यह गर्व और प्रसन्नता का विषय है कि हम विदेश मंत्रियों में से ही एक विदेश मंत्री आज इस उच्च पद पर आसीन हैं।’ अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति को ‘लोक केन्द्र में लाने के आपके प्रयासों की भारत सराहना करता है। इस सत्र के लिए आपने जो विषय चुना है- ‘फोकसिंग ऑन प्यूपिल: स्ट्राइविंग फॉर पीस एंड ए डिसेंट लाइफ ऑफ ए सस्टेनेबल प्लेनेट’ उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं।

संयुक्त राष्ट्र का तो गठन ही इस पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के कल्याण के लिए, उनकी सुरक्षा के लिए, उनके सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए और उनके अधिकारों के बचाव के लिए हुआ है। इसलिए इन सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आपको मेरे देश का पूरा-पूरा समर्थन मिलेगा।सुषमा स्वराज ने कहा, ‘मैंने पिछले वर्ष भी इस सभा को संबोधित किया था। इस एक वर्ष के अन्तराल में संयुक्त राष्ट्र में और दुनियाभर में भी अनेक तरह के परिवर्तन हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र में एक नए महासचिव चुने गये हैं। वह संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए और एक सशक्त संस्था बनाने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं।

उन प्रयासों का भी हम स्वागत करते हैं और उन्हें परिवर्तन के एक पुरोधा के रूप में देखते हैं।’आज का विश्व अनेक संकटों से ग्रस्त है। हिंसा की घटनायें निरन्तर बढ़ रही हैं। आतंकवादी विचारधारा आग की तरह फैल रही है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती हमारे सामने मुंह बाये खड़ी है। समुद्री सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। विभिन्न कारणों से अपने देशों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन वैश्विक चिन्ता का विषय बन गया है। विश्व की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी और भूखमरी से जूझ रहा है। बेरोजगारी से त्रस्त युवा अधीर हो रहा है। पक्षपात से पीड़ति महिलायें समान अधिकारों की मांग कर रही हैं। परमाणु प्रसार का विषय पुन? सिर उठा रहा है। साइबर सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।इन संकटों में से बहुत से संकटों का समाधान करने के लिए हमने वर्ष 2015 में वर्ष 2030 तक का एजेंडा तय किया है। उसके 2 वर्ष बीत गए, 13 वर्ष बाकी हैं। यदि इन 13 वर्षों में वास्तव में हमें इन लक्ष्यों की प्राप्ति करनी है तो यथास्थिति से बाहर निकलना होगा। यथास्थिति बनाए रखकर इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। हमें अपनी निर्णय प्रक्रिया में तेजी लानी होगी और कठोर फैसले लेने का साहस जुटाना होगा।मुझे प्रसन्नता है कि भारत ने इस सन्दर्भ में बहुत अभिनव पहल की है।

बड़े-बड़े साहसिक निर्णय लिए हैं और टिकाऊ विकास के लक्ष्य को केन्द्र में रखते हुए अनेक योजनाएं बनाई हैं। गरीबी को दूर करना टिकाऊ विकास का पहला और प्रमुख लक्ष्य है। गरीबी को दूर करने के दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता है, आप उनका सहारा बनें और उनका हाथ पकड़कर उन्हें चलायें। दूसरा रास्ता है, आप उन्हें ही इतना सशक्त कर दें कि उन्हें किसी के सहारे की आवश्यकता ही ना पड़े और वो अपना सहारा आप बन जायें। हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने गरीबी निवारण के लिए दूसरा रास्ता चुना है और इसीलिए वह गरीबों का सशक्तिकरण करने में जुटे हैं।हमारी सारी योजनाएं गरीब को शक्तिशाली बनाने के लिए चलाई जा रही हैं।

जैसे जन-धन योजना, मुद्रा योजना, उज्जवला योजना, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, क्लीन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया। योजनाएं तो अनेक हैं किंतु समय की कमी के कारण मैं केवल तीन योजनाओं का ही उदाहरण यहां देना चाहूंगी।सबसे पहली योजना है जन-धन योजना, जिसके अन्तर्गत हमने विश्व का सबसे बड़ा आर्थिक समावेश किया है। जिन गरीबों ने कभी बैंक का द्वार नहीं देखा था, ऐसे 30 करोड़ लोगों को हमने बैंक के अन्दर पहुंचाया है और उनका खाता खुलवाया है। जिनके पास पैसे नहीं थे उनका बैंक अकाउंट हमने ज़ीरो बैलेन्स से खुलवाया है। दुनिया में किसी ने यह नहीं सुना होगा की अकाउंट में पैसा नहीं होते हुए भी लोगों के पास पासबुक है। यह असंभव काम भी भारत में संभव हुआ है।

30 करोड़ की संख्या का अर्थ है अमेरिका जैसे देश की पूरी आबादी। 3 वर्षों में 30 करोड़ लोगों को बैंकों से जोड़ना कोई आसान काम नहीं था किन्तु मिशन मोड में इसे किया गया। कुछ लोग अभी बचे हैं किन्तु कार्य जारी है क्योंकि हमारा लक्ष्य 100% जनसंख्या का आर्थिक समावेश करना है।दूसरी योजना है मुद्रा योजना जो केवल फंडिंग फॉर द अनफंडेड के लिए बनाई गई है यानि जिसे कभी बैंक से कोई ऋण नहीं मिला, उसे मुद्रा योजना के अन्तर्गत ऋण देने की व्यवस्था की गई है। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि इस योजना के अन्तर्गत 70 प्रतिशत से अधिक ऋण केवल महिलाओं को दिया गया है। बेरोजगारी गरीबी को जन्म देती है। इसीलिए स्किल इंडिया योजना के अन्तर्गत गरीब और मध्यम वर्ग के युवाओं के लिए, उनकी रूचि और योग्यता के अनुसार कौशल देने के बाद मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इंडिया योजना और स्टैंड अप इंडिया योजना के अन्तर्गत ऋण देकर स्वरोजगार के काबिल बनाया जा रहा है।तीसरी योजना है उज्जवला योजना।

सभापतिजी, गरीब महिलाओं को हर रोज रसोई का ईंधन जुटाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है और उनकी आंखें धुएं से अंधी हो जाती हैं। इन दोनों कष्टों का निवारण करने के लिए उन्हें मुफ्त गैस सिलेंडर दिया जा रहा है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण कदम है।नोटबंदी जैसे साहसिक फैसले ने भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार किया है। जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय ने एक राष्ट्र, एक कर की कल्पना को साकार करके व्यापार में बार-बार टैक्स देने की असुविधा को समाप्त किया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के अन्तर्गत लैंगिक समानता जैसे विषयों पर जोर देकर और स्वच्छ भारत अभियान चलाकर भारत एक सामाजिक क्रांति की ओर बढ़ रहा है।मैं यहां यह अवश्य कहना चाहूंगी कि समर्थ देश तो अपने बल-बूते पर इन लक्ष्यों को प्राप्त कर लेंगे लेकिन छोटे और अविकसित देशों की मदद हम सबको करनी होगी।

इसीलिए इन एसडीजी में ग्लोबल पार्टनरशिप का सिद्धांत रखा गया था। उस सिद्धांत के अनुरूप हम सभी उनकी मदद करें ताकि छोटे देश भी 2030 तक इन लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता है कि भारत ने इस वर्ष इंडिया-यूएन डेवेल्पमेंट पार्टनरशिप फंड की शुरुआत की है।हम तो गरीबी से लड़ रहे हैं किन्तु हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान हमसे लड़ रहा है। परसों इसी मंच से बोलते हुए पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म शाहिद खाकान अब्बासी ने भारत पर तरह-तरह के इल्जाम लगाये। हमें स्टेट स्पांसर टेरेरिस्म फैलाने का गुनहगार भी बताया और मानवाधिकार उल्लंघन का आरोपी भी। जिस समय वो बोल रहे थे तो सुनने वाले कह रहे थे- लुक, हू इज टाकिंग। जो मुल्क हैवानियत की हदें पार करके दहशतगर्दी के जरिये सैकड़ों बेगुनाहों को मौत के घाट उतरवाता है, वो यहां खड़े होकर हमें इंसानियत का सबक सिखा रहा था और मानवाधिकार का पाठ पढ़ा रहा था?पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म ने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान को शांति और दोस्ती की विदेश नीति विरासत में दी थी।

मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगी कि जिन्ना साहब ने शांति और दोस्ती की नीति दी थी या नहीं यह तो इतिहास बखूबी जानता है लेकिन हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो शांति और दोस्ती की नीयत ज़रूर दिखाई थी। हर तरह की रुकावटों को पार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया किन्तु कहानी बदरंग किसने की? इसका जवाब आपको देना है, हमें नहीं!वो यहां खड़े होकर संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रस्तावों की बात भी कर रहे थे। पर क्या उन्हें याद नहीं कि शिमला समझौते और लाहौर डिक्लेरेशन के अन्तर्गत हम दोनों देश अपने मसलों को आपस में बैठकर ही तय करने का निर्णय कर चुके हैं।

सच्चाई तो यह है कि पाकिस्तान के सियासतदानों को याद तो सब कुछ है लेकिन अपनी सुविधा के लिए वो जब चाहें तब उसे भूल जाने का नाटक करते हैं। पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म ने कॉप्रेहेंसिव डॉयलॉग  की भी बात की। मैं उन्हें याद दिला दूं कि 9 दिसम्बर, 2015 को हॉर्ट ऑफ एशिया के सम्मेलन के लिए जब मैं इस्लामाबाद गई थी तो उनके नेता, उस समय के वज़ीर-ए-आज़म नवाज़ शरीफ़ की सरपरस्ती में नए सिरे से डॉयलॉग शुरू करने का फैसला हुआ था और उसे नया नाम भी दिया गया था- कॉम्प्रिहेंसिव बाइलेटरल डॉयलॉग. बाइलेटरल शब्द सोच समझकर डाला गया था कि कोई संदेह, कोई शक-शुबहा ही ना रहे कि बातचीत केवल दोनों देशों के बीच में होनी है, किसी तीसरे की मदद लेकर नहीं।

लेकिन वो सिलसिला आगे क्यों नहीं बढ़ा, इसके लिए जवाबदेह आप हैं, हम नहीं। आज इस मंच से मैं पाकिस्तान के सियासतदानों से एक सवाल पूछना चाहती हूं कि क्या कभी अपने अंदर झांककर यह सोचा है कि भारत और पाकिस्तान साथ-साथ आजाद हुए थे। दुनिया में आज भारत की पहचान आईटी के सुपरपॉवर के रूप में है और पाकिस्तान की पहचान एक दहशतगर्द मुल्क के रूप में है, एक आतंकवादी देश के रूप में है। इसकी वजह क्या है? वजह केवल एक है कि भारत ने पाकिस्तान द्वारा दी गई आतंकवादी चुनौतियों का मुकाबला करते हुए भी अपने घरेलू विकास को कभी थमने नहीं दिया। 70 वर्ष के दौरान भारत में बहुत सारे राजनैतिक दलों की सरकारें बनीं लेकिन सभी ने विकास की गति को जारी रखा।

हमने विश्व प्रसिद्ध इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी बनाए, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बनाए और एम्स जैसे बड़े अस्पताल बनाए। लेकिन आपने क्या बनाया? आपने आतंकवादी ठिकाने बनाए, आतंकी कैम्प बनाए। हमने स्कॉलर पैदा किए, इंजीनियर्स पैदा किए, डॉक्टर्स पैदा किए। आपने क्या पैदा किया? आपने दहशतगर्द पैदा किए, जेहादी पैदा किए। आपने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और हक्कानी नेटवर्क पैदा किए। आप जानते हैं ना कि डॉक्टर्स मरते हुए लोगों को बचाते हैं और आतंकवादी, जिन्दा लोगों को मारते हैं। आपके ये आतंकवादी संगठन केवल भारत के लोगों को ही नहीं मार रहे बल्कि दो और पड़ोसी देश अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश के लोग भी उनकी गिरफ्त में हैं।

संयुक्त राष्ट्र आम सभा इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी देश को राइट टू रिप्लाई माँग कर एक साथ तीन-तीन देशों को जवाब देना पड़ा हो। क्या यह तथ्य पाकिस्तान की करतूतों को नहीं दर्शाता? जो पैसा आप आतंकवादियों की मदद के लिए खर्च कर रहे हैं वही पैसा यदि आप अपने मुल्क के विकास के लिए खर्च करें, अपने अवाम की भलाई के लिए खर्च करें तो एक तो दुनिया को राहत मिल जाएगी और दूसरा आपके अपने देश के लोगों का कल्याण भी हो पाएगा।  संयुक्त राष्ट्र आज जिन समस्याओं का समाधान ढूंढ रहा है, उसमें से सबसे प्रमुख हैं- आतंकवाद। भारत आतंकवाद का सबसे पुराना शिकार है। जिस समय हम आतंकवाद शब्द का प्रयोग करते थे तो विश्व के बड़े-बड़े देश इसे कानून और व्यवस्था का विषय बता कर खारिज कर देते थे।

किन्तु आज जब आतंकवाद ने चारों ओर अपने पैर पसार लिए तो सभी देश इसकी चिन्ता कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस विषय पर हमें अन्तर्मुखी होकर सोचने की जरूरत है यानि इंट्रोस्पेक्शन की जरूरत है। हम सभी देश द्विपक्षीय वार्ताओं में, बहुपक्षीय वार्ताओं में जो भी संयुक्त वक्तव्य जारी करते हैं, सभी में आतंकवाद की भर्त्सना करते हैं और उससे लड़ने की एकजुटता का संकल्प भी लेते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि यह एक रस्म बन गई है, जिसे हम निभा तो देते हैं, किन्तु जब वास्तव में उस संकल्प को पूरा करने का समय आता है तो कुछ देश अपने-अपने हितों को सामने रखकर निर्णय करते हैं। यह सिलसिला अनेक वर्षों से चल रहा है और यही कारण है कि 1996 में भारत द्वारा प्रस्तावित सीसीआईटी पर अभी तक संयुक्त राष्ट्र निर्णय नहीं ले सका।

सीसीआईटी की सभी धाराओं पर सहमति बन गई है सिवाय एक धारा के और वह है आतंकवाद की परिभाषा। परिभाषा ही तो जड़ है, उसी में से तो अच्छे और बुरे आतंकवादी का अन्तर उभर कर आता है। यदि परिभाषा पर ही सहमति नहीं बनेगी तो हम एकजुट होकर कैसे लड़ेंगे। यदि मेरे और तेरे आतंकवादी को हम अलग दृष्टि से देखेंगे तो एकजुट होकर कैसे लड़ेंगे। यदि सुरक्षा परिषद् जैसी प्रमुख संस्था में आतंकवादियों की लिस्टिंग पर मतभेद उभरकर आएंगे तो हम एकजुट होकर कैसे लड़ेंगे।  इसलिए आपके माध्यम से मेरा इस सभा से विनम्र अनुरोध है कि हम अलग-अलग नज़रिये से आतंकवाद को देखना बन्द करें। समदृष्टि बनायें और स्वीकार करें कि आतंकवाद, समूची मानवता के लिए खतरा है। कोई भी कारण कितना भी बड़ा क्यों ना हो, हिंसा का औचित्य नहीं बन सकता। इसलिए एकजुटता से लड़ने का संकल्प लें, तो उसे मानें भी और मानेंतो उसे अमली जामा भी पहनायेंऔर इस वर्ष सीसीआईटी की परिभाषा पर सहमति बना कर उसे पारित कर दें।

एक संकट मैंने जलवायु परिवर्तन के बारे में बताया था।जलवायु परिवर्तन के संबंध में भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पैरिस समझौते की सफलता के लिए प्रतिबद्ध है। और यह प्रतिबद्धता किसी लोभ या भय के कारण नहीं है। यह प्रतिबद्धता हमारी 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति के कारण है। इस विषय में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी ओर से एक अभिनव पहल करके इंटनेशनल सोलर एलाइंस का गठन किया है। हम समूचे विश्व की शांति की कामना करते हैं और केवल प्राणियों की शांति की ही कामना नहीं करते। हम पृथ्वी की शांति की भी कामना करते हैं, हम अन्तरिक्ष की शांति की भी कामना करते हैं, हम वनस्पति की शांति की भी कामना करते हैं और हम प्रकृति की शांति की कामना भी करते हैं। क्योंकि प्रकृति को जब नष्ट किया जाता है तो प्रकृति अशांत होकर विरोध जताती है और यदि विनाश को ना रोका जाये तो रौद्र रूप धारण करके सर्वनाश कर देती है।

कभी भूकम्प, कभी झंझावात, कभी भयंकर वर्षा, कभी बाढ़ और तूफान, सभी माध्यमों के जरिये ये प्रमाण सामने आते रहते हैं। हाल ही में आ रहे हरिकेन मात्र एक संयोग नहीं हैं। जिस समय संयुक्त राष्ट्र का ये सम्मेलन चल रहा है और विश्व का समूचा नेतृत्व यहाँ न्यूयॉर्क में इकट्ठा है, उस समय प्रकृति द्वारा दी गई ये चेतावनी है। सम्मेलन शुरू होने से चंद दिन पहले ही हॉर्वे और इरमा जैसे हरिकेन आने शुरू हो गए। सम्मेलन के चलते भी मैक्सिको में भूकम्प आया और डोमिनिका में हरिकेन आया। इस चेतावनी को हम समझें और बैठकों में केवल चर्चा करके न उठ जायें। बल्कि संकल्पशीलता से आगे बढ़ें और विकसित देश अविकसित देशों की मदद के लिए टेक्नालॉजी ट्रॉन्सफर और ग्रीन क्लाइमेंट फाइनेंसिंग की अपनी प्रतिबद्धता पूरी करें, ताकि हम अपनी भावी पीढ़ियों को सर्वनाश से बचा सकें।  हम विश्व की अनेक समस्याओं पर चर्चा कर रहे हैं लेकिन जो संस्था इन समस्याओं के समाधान के लिए बनी हैं, वो स्वयं भी समस्याग्रस्त है। अभी कुछ दिन पहले 18 तारीख़ को संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के विषय में यहाँ एक बैठक बुलायी गयी थी जिसमे मैं भी उपस्थित थी।

उसबैठक में मंच से किये गये भाषणों में सुधारों के ना होने के कारण एक वेदना झलक रही थी और सुधार करने के लिये संकल्पशीलता भी दिख रही थी।किंतु मैं याद कराना चाहूँगी कि वर्ष 2005 के विश्व सम्मेलन के दौरान यह सहमति बनी थी कि जब संयुक्त राष्ट्र में सुधारकी प्रक्रिया प्रारम्भ की जायेगी तो सुरक्षा परिषद् के सुधार और विस्तार को प्रमुख तत्व के रूप में शुरू किया जाएगा। सुरक्षा परिषद् के सुधारों के संबंध में पिछले सत्र में टेस्ट बेस्ड नेगोशिएशन के प्रयास शुरू किए गए थे और 160 से अधिक सदस्यों ने उसके लिये समर्थन भी व्यक्त किया था। यदि हम इस विषय पर गंभीर रूप से चर्चा करना चाहते हैं तो टेस्ट बेस्ड नेगोशिएशन का एक ळी७३ तो अवश्य होना ही चाहिए।  आपको इस सत्र में टेस्ट बेस्ड नेगोशिएशन प्रारंभ करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होगी। मैं आशा करती हूँ कि आपके सभापतित्व में यह विषय एक प्राथमिकता बनेगा ताकि बाद में हम इसे आपकी एक उपलब्धि के रूप में बदल सकें।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से भी हम सबको बहुत उम्मीदें हैं। यदि वोअंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के ढांचे में सुधार करना चाहते हैं तो उन्हें यूएन पीस कीपींग से संबंधित मुद्दों का भी समाधान करना होगा। यूएन पीस कीपींग में सुधार के बिना यह कार्य संभव नहीं हो सकेगा।  विषय तो अनेक हैं, जिन पर इस मंच से बोला जाना चाहिए। मैंने वह विषय प्रारंभ में ही गिना भी दिए थे लेकिन समय की कमी के कारण उन पर विस्तार से बोला जाना संभव नहीं है। वैसे भी जो विषय आपने इस सभा के लिए चुना है, वो लोगों के द्वारा सभ्य जीवन जीने औरशांति-पूर्वक जीवन जीने पर ही केंद्रित है। यह विषय संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के भी अनुरूप है और मेरे देश की संस्कृति के भी अनुरूप है।

मेरे देश की संस्कृति पूरी वसुधा के लोगों के सुखों की कामना करने वाली संस्कृति है। हम वसुधैव कुटुम्बकम् कहकर पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं और केवल अपनी नहीं सभी के सुख की कामना करते हैं। उसी कामना के मंत्र के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करना चाहूंगी। हम कहते हैं – सर्वे भवन्तु सुखिन?, सर्वे सन्तु निरामया?। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दु?खभाग्भवेत्।हि

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