भारतीय जीपीएस- इसरो और सीएसआईआर के बीच हुआ समझौता

नई दिल्ली: भारत में जल्द ही अपना जीपीएस तंत्र ‘नेविगेशन विद इंडियन काउंस्टलेशन’ होगा जिसके बाद किसी स्थिति का पता लगाने के लिए अमेरिका-आधारित राष्ट्रीय मानक और प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएसटी) पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। सीएसआईआर और इसरो के बीच शुक्रवार को ‘फ्रीक्वेंसी ट्रेसेबिल्टी’ संबंधी एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए जिसके तहत सीएसआईआर इसरो को यह सुविधा प्रदान करेगा। सीएसआईआर की दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला भारत के मानक समय को तय करने का काम करती है।

इसके तहत नवीनतम तकनीक का प्रयोग कर मानक समय का सही आंकलन, उसे स्थापित करने तथा बनाये रखने और आगे जारी करने का काम किया जाता है। यही मानक समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वभौमिक समन्वित समय (यूटीसी) जिसे अंतरराष्ट्रीय भार एवं माप ब्यूरो (बीआईपीएस) के साथ समन्वय बनाता है।

एनपीएल इसरो द्वारा तैयार किये जाने वाले स्वतंत्र भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह तंत्र (आईआरएनएसएस) को यूटीसी पता लगाने की क्षमता प्रदान करेगा। देसी जीपीएस औपचारिक रूप से दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) द्वारा बनाए रखे गए भारतीय मानक समय (आईएसटी) के साथ सिंक्रनाइज़ हो जाएगी।

एमओयू पर हस्ताक्षर के दौरान विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन एवं प्रधानमंत्री कार्यालय में अंतरिक्ष मंत्रालय के राज्यमंत्री डॉक्टर जितेंद्र सिंह मौजूद थे। जीपीएस(ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) एक सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम है जो स्थिति और समय जैसी सूचना बताता है।

यह तंत्र अमेरिका रक्षा विभाग ने विकसित किया था। जीपीएस रिसीवर(जैसे मोबाइल) के साथ काम करता है जो सैटेलाइट से मिले डाटा के आधार पर गणना करता है। गणना को ट्राइएंगुलेशन कहते हैं जहां स्थिति का कम से कम एक बार में तीन सैटेलाइट की मदद से पता की जाती है।

सही स्थिति का पता करने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट का सहारा लेना पड़ता है। एक बार जब इन सभी का पता चल जाता है। इसके लिए सेटेलाइट से रिसीवर की दूरी और सिग्नल भेजते समय क्या समय था दोनों जानकारी के आधार पर स्थिति का पता चलता है।

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