राजनीतिक चंदे के लिए निर्वाचन बॉन्ड का औचित्य: प्रमोद भार्गव

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कहने को तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कालेधन पर अंकुश के लिए तमाम उपाय करती दिख रही है। इस नाते नोटबंदी जैसा साहसिक कदम उठाया। बेनामी संपत्ति पर अंकुश के लिए सख्त कानून बनाया। जीएसटी के जरिए भी कालेधन के सृजन पर अंकुश लगेगा। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को संबोधित करते हुए कहा है कि जीएसटी लागू होने के साथ ही गोरखधंधा करने वाली सौ कंपनियां बंद हो गईं।

इसी कार्यक्रम में जानकारी दी गई की सरकार राजनीतिक चंदे के लिए जल्द इलेक्टोरल बॉन्ड अर्थात ‘निर्वाचन बॉन्ड’ ला रही है। इस पर भारत निर्वाचन आयोग ने आपत्ति जताते हुए सरकार को लिखित में कहा है कि इससे चंदे में पारदर्शिता समाप्त होगी। आम लोगों को यह पता ही नहीं चल पाएगा कि किस दल या उम्मीदवार को कितना चंदा मिला? आयोग ने सरकार द्वारा जनप्रतिनिधित्व कानून में किए गए उस बदलाव पर भी आपत्ति दर्ज कराई है जिसमें राजनीतिक दल को बॉन्ड के जरिए ली गई धनराशि को ऑडिट रिपोर्ट में दर्शाने की बाध्यता खत्म कर दी है।

‘वित्त विधेयक-2017’ के जरिए इलेक्टोरल बॉन्ड का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान से स्पष्ट होता है कि सरकार राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता के हक में नहीं है। वित्त विधेयक-2017 में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति या कंपनी चेक या ई-पेमेंट के जरिए चुनावी बॉन्ड खरीद सकता है। ये बियरर चेक की तरह बियरर बॉन्ड होंगे। मसलन इन्हें दल या व्यक्ति चेकों की तरह बैंकों से भुना सकते हैं।

चूंकि बॉन्ड केवल ई-ट्रांसफर या चेक से खरीदे जा सकते हैं, इसलिए खरीदने वाले का पता होगा, लेकिन पाने वाले का नाम गोपनीय रहेगा। अर्थशास्त्री इसे कालेधन को बढ़ावा देनी वाली पहल बता रहे हैं। इस प्रावधान में ऐसा लोच है कि कंपनियां इस बॉन्ड को राजनीतिक दलों को देकर फिर से किसी अन्य रूप में वापस ले सकती हैं। कंपनी या व्यक्ति बॉन्ड खरीदने पर किए गए खर्च को बहीखाते में तो दर्ज करेंगी, लेकिन यह बताने को मजबूर नहीं रहेंगी कि उसने ये बॉन्ड किसे दिए हैं।

यही नहीं सरकार ने कंपनियों पर चंदा देने की सीमा भी समाप्त कर दी है। बॉन्ड के जरिए 20 हजार रुपये से ज्यादा चंदा देने वाली कंपनी या व्यक्ति का नाम भी बताना जरूरी नहीं है। जबकि इसी सरकार ने कालेधन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे में पारदार्शिता लाने की पहल करते हुए आम बजट में नगद चंदे की सीमा 20 हजार रुपये से घटाकर दो हजार रुपये कर दी थी। केंद्र सरकार ने यह पहल निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर की थी।

आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन का सुझाव दिया था। फिलहाल दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत दलों को 20 हजार रुपये से कम के नगद चंदे का स्रोत बताने की जरूरत नहीं है। इसी झोल का लाभ उठाकर दल बड़ी धनराशि को 20 हजार रुपये से कम की राशियों में सच्चे-झूठे नामों से बही खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते रहे हैं। इस कानून में संशोधन के बाद जरूरत तो यह थी कि दान में मिलने वाली दो हजार तक की राशि के दानदाता की पहचान को आधार से जोड़ा जाता, जिससे दानदाता के नाम का खुलासा होता रहता।

ऐसा न करते हुए सरकार ने निर्वाचन बॉन्ड के जरिए उपरोक्त प्रावधानों पर पानी फेर दिया है। अजीब बात यह है कि निर्वाचन बॉन्ड के प्रावधान का विरोध अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं किया है। इससे लगता है कि राजनीति दलों के हमाम में सभी नंगे हैं। क्योंकि सभी दल उद्योगपतियों से नामी-बेनामी चंदा लेकर ही अपना राजनीतिक सफर तय करके मंजिल पर पहुंचते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होते हैं। इस खर्च में बड़ी धनराशि कालाधन और आवारा पूंजी होती है। यह औद्योगिक घरानों और बड़े व्यापारियों से ली जाती है।

आर्थिक उदारवाद के बाद यह बीमारी सभी दलों में पनपी है। इस कारण दलों में जनभागीदारी निरंतर घट रही है। अब किसी भी दल के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पार्टी का सदस्य नहीं बनाती हैं। मसलन कॉरपोरेट फंडिंग ने ग्रास रूट फंडिंग का काम खत्म कर दिया है। इस कारण अब तक सभी दलों की कोशिश रही है कि चंदे में अपारदर्शिता बनी रहे। इस वजह से दलों में जहां आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हुआ, वहीं आम आदमी से दूरियां भी बढ़ती चली गईं। नतीजतन लोकसभा और विधानसभाओं में पूंजीपति जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

वर्तमान लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की घोषित संपत्ति 10 हजार करोड़ रुपये (एक खरब) से अधिक है। चुनाव आयोग के अनुसार वर्तमान लोकसभा के 543 सांसदों में से 350 सांसद करोड़पति और 18 अरबपति हैं। यही कारण है कि ऐसे कानून ज्यादा देखने में आ रहे हैं, जो पूंजीपतियों के हित साधने वाले हैं। ऐसे कानून और फैसले तब ज्यादा देखने में आते हैं, जब केंद्र या राज्य सरकारों का कार्यकाल पूरा होने को हो रहा हो। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स के मुताबिक, साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों को 2100 करोड़ रुपये का चंदा मिला है। इसका 63 प्रतिशत नकदी के रूप में लिया गया।

इसके अलावा पिछले तीन लोकसभा चुनावों में भी 44 फीसदी चंदे की धनराशि नकदी के रूप में ली गई। राजनीतिक दल उस 75 फीसदी चंदे का हिसाब देने को तैयार नहीं है, जिसे वे अपने खातों में अज्ञात स्रोतों से आया दर्शा रहे हैं। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 में व्यापारिक घरानों के चुनावी न्यासों से दलों को 177.40 करोड़ रुपये चंदे के रूप में मिले हैं। इनमें सबसे ज्यादा चंदा 111.35 करोड़ भाजपा, 31.6 करोड़ कांग्रेस, एनसीपी 5 करोड़, बीजू जनता दल 6.78 करोड़, आम आदमी पार्टी 3 करोड़, आईएनएलडी 5 करोड़ और अन्य दलों को 14.34 करोड़ रुपये मिले हैं। दरअसल राजनीतिक दलों और औद्योगिक घरानों के बीच लेनदेन में पारदार्शिता के नजरिए से 2013 में संप्रग सरकार ने कंपनियों को चुनावी ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी थी। ये आंकड़े उसी के परिणाम हैं।क्षेत्रीय दल भी चंदे में पीछे नहीं हैं।

2004 से 2015 के बीच हुए 71 विधानसभा चुनावों के दौरान क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने कुल 3368.06 करोड़ रुपये चंदा लिया है। इसमें 63 फीसदी हिस्सा नकदी के रूप में आया। वहीं, 2004, 2009 और 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को 1300 करोड़ रुपये चंदे में मिले। इसमें 55 प्रतिशत राशि के स्रोत ज्ञात रहे, जबकि 45 फीसदी राशि नकदी में थी, जिसके स्रोत अज्ञात रहे। वर्ष 2004 और 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त को जमा किए चुनावी खर्च विवरण में बताया गया है कि समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा मिला है। चंदे के इन आंकड़ों से पता चलता है कि बहती गंगा में सभी दल हाथ धोने में लगे हैं।

निर्वाचन बॉन्ड ने तो अब दलों और उम्मीदवारों को यह सुविधा भी दे दी कि उन्हें जो चंदा बॉन्ड के जरिए मिलेगा, उसकी जानकारी निर्वाचन आयोग को भी देने की जरूरत नहीं है। अब तक आयोग चंदे की जानकारी अपनी वेबसाइट पर नियमित रूप से डालता रहा है। गोया, चंदे में पारदर्शिता के लिहाज से निर्वाचन बॉन्ड से चंदा लेने का औचित्य समझ से परे है।

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