महिलाओं के कुछ गुण जो पुरुष से भी है असामान्य

नई दिल्ली: एक नई रिसर्च सामने आई है। जो पुरुष महिलाओं के बीच रहते हैं, उन्हें स्ट्रेस और डिप्रेशन की शिकायत कम होती है। और जो महिलाएं महिलाओं के बीच रहती हैं, उन्हें भी स्ट्रेस और डिप्रेशन की शिकायत कम होती है। मतलब, महिलाओं के साथ रहने से आप बहुत-सी बीमारियों से खुद को बचा सकते हैं। ऐसा बिल्कुल मत सोचिएगा कि यह एक ख्याल मात्र है। यह एक वैज्ञानिक सचाई है।

बात यह है कि पुरुष का दिमाग चौकोर होता है, जो कई खानों में बंटा होता है। एक में काम, दूसरे में आराम, तीसरे में शोहरत, चौथे में पैसा। मैंने चार खाने लिखे हैं, इसका मतलब यह बिलकुल नहीं कि चार ही खाने होते हैं। मुमकिन है, सौ खाने होते हों। मतलब वह अलग-अलग तरह समय पर अलग-अलग बातें सोच सकते हैं। पर एक महिला का दिमाग गोल होता है।

रुकिए, ऐसा कहते ही आप महिला और पुरुष के दिमाग का एक्स-रे लेकर मत बैठ जाइएगा कि देखें, कहां चौकोर और गोल जैसा कुछ है? भौतिक रूप में दिमाग एक जैसा ही होता है, लेकिन महिलाओं का दिमाग गोल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसमें अलग-अलग खानों की सीमा नहीं होती। एक महिला खाना बनाते हुए बच्चे को होमवर्क करा सकती है। खाते हुए घर के बारे में सोच सकती है। ऑफिस में काम करते हुए रात की पार्टी की तैयारी कर सकती है। वह एक साथ कई तरफ सोच सकती है, कुछ करना चाहे तो कर सकती है। पर पुरुष नहीं! वह एक बार में एक ही काम कर सकते हैं। ज्यादा काम देंगे तो वे परेशान हो जाएंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुष जल्दी तनाव में आते हैं, गुस्से में आते हैं, डिप्रेशन में आते हैं और जल्दी घबरा जाते हैं लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है। वे तनाव में नहीं आतीं, डिप्रेशन में भी नहीं आतीं और बेशक कई बार आपको लगे कि वे जल्दी घबरा जाती हैं, पर सचाई यही है कि वे पुरुषों की तुलना में कम घबराती हैं। महिलाओं के मन में ज़िंदगी का जश्न पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है। इसीलिए वे किसी खुशी के मौके पर आसानी से डांस कर लेती हैं, गुनगुना लेती हैं। पुरुष यही कहते हैं कि वे भला नृत्य कैसे कर सकते हैं? मर्द नाचने के लिए नहीं होते। वे तो युद्ध करने के लिए होते हैं।

ये सारी बातें यहां इसलिए हो रही हैं कि कल शाम मैं अपने एक परिचित के घर गया था, जो इन दिनों अकेले रह रहे हैं। उनकी पत्नी कुछ दिनों से बाहर गई हैं और उन्होंने मुझसे कहा था कि आजकल वह बैचलर लाइफ जी रहे हैं। उनकी बैचलर लाइफ देखने के लिए ही मैं वहां गया था। पर मैंने देखा कि वह एकदम उदास अपने कमरे में बैठे थे। मैंने सोचा था कि चार दोस्तों को बुला कर वह पार्टी-वार्टी कर रहे होंगे, पर ऐसा कुछ नहीं था। उन्होंने बताया कि पहले दो दिन तो घर पर पार्टी-वार्टी की, लेकिन जल्द ही मन इन सबसे उकता गया। ऑफिस से घर आता हूं तो समझ में नहीं आता कि क्या करूं? पत्नी जब कुछ महीनों के लिए जा रही थी तो मन ही मन मैं खुश था, पर अब लगता है कि उसके बिना घर काट रहा है। कुछ भी व्यवस्थित नहीं। मैं हैरान हो रहा हूं यह सोच कर कि वह भी ऑफिस जाती थी, पर घर का हर काम व्यवस्थित चलता था। अब सब कुछ अव्यवस्थित-सा हो गया है। मेरी सुबह तो चाय में ही खत्म हो जाती है। भागता हुआ ऑफिस जाता हूं। फिर वहीं कुछ खाता हूं और शाम को घर आते ही लगता है, करने को कुछ नहीं। दो दिन हुड़ंदंगी पार्टी करने के बाद लगा कि यह भी कोई काम है?

बच्चे पहले ही बाहर चले गए थे। अब पत्नी चली गई है। वह आएगी दो महीने बाद। मेरे से तो दो हफ्ते नहीं कट रहे। मैं सोचता हूं कि पुराने ज़माने में महिलाएं कई-कई महीनों के लिए अपने मायके जाती थीं, तो मर्द कैसे रहते थे? फिर ध्यान आया कि पहले संयुक्त परिवार होता था। पत्नी चली गई तो घर में मां होती थी, चाची होती थीं, बहनें आती-जाती रहती थीं। अब एकल परिवार में तो पत्नी मायके नहीं जाती, पर किसी ट्रेनिंग पर ही चली गई तो अकेलापन काटने लगा है। वह कह रहे थे, ‘मैं भी कई बार बाहर जाता हूं। मेरी पत्नी अकेले रहती है, पर उसने कभी शिकायत नहीं कि वह अकेली है। उसे अकेलापन कचोट रहा है। ऐसा कैसे और क्यों?’

बात तो मेरी समझ में भी नहीं आई। वैसे ऐसा मेरे साथ भी होता है। मैंने अपनी पत्नी को फोन करके पूछा कि ऐसा क्यों होता है तो वह हंसने लगी। उसने कहा कि महिलाओं के साथ हमेशा एक संसार रहता है। वे अकेली भी रहेंगी तो अकेली नहीं होंगी। वे खाना बनाएंगी, घर ठीक करेंगी और अगर ऑफिस जाती हैं तो फिर तो पूछो ही मत! महिलाएं कभी अकेली नहीं होतीं। अकेलापन पुरुषों की बीमारी है। उन्हें कुछ नहीं करना होगा, तब भी वे बहुत कुछ करती रहती हैं।

मैंने कहा कि मेरे परिचित तो उदास हैं। डिप्रेशन में हैं। इस पर पत्नी ने कहा कि उनसे कहो कि घर के गमलों में पानी डालें। कोई नहीं है तो पौधों से बातें करें। कोई नई रेसपी के बारे में पढ़ें। उसे बना कर खुद खाएं, दोस्तों को खिलाएं। यह कोई पार्टी नहीं होती कि पिज्ज़ा ऑर्डर कर दिया और खा लिया। कुछ करें। कुछ क्रिएटिव करें, पर नहीं करेंगे। कर ही नहीं सकते। दिमाग एक ही दिशा में चलता है। ऑफिस और बस ऑफिस। ऐसे में अकेला घर तो चुभेगा ही! उनसे कहो कि महिलाओं के बीच रहा करें। उनसे ज़िंदगी के जश्न को जीना सीखें।

मैंने अपने परिचित से कुछ कहा नहीं। चुपचाप लौट आया। पर मन ही मन सोचता रहा कि बात तो सही है। मैं हर हफ्ते छुट्टी वाले दिन कहीं बाहर चला जाता हूं, पर मेरी पत्नी आराम से अकेली रह लेती है। मुझसे कोई घर में एक दिन अकेला रहने को कह दे तो मैं सारे काम उलटा-पुलटा कर दूं। सारे घर की बत्ती ऑन रह जाएगी। कई कमरों के एसी चलते छूट जाएंगे। दूध उबल कर नीचे गिर जाएगा। पौधों में पानी डालना भूल जाऊंगा, पर मेरी पत्नी ऑफिस के काम के साथ-साथ अपने गोल दिमाग से बाकी सब भी करती चली जाती है। मैंने सोच लिया है कि खुश रहना है तो महिलाओं से ही दोस्ती करनी चाहिए। ज़िंदगी का जश्न वही मना सकती हैं, मर्द नहीं!

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