केंद्र सरकार का फरमान, रोहिंग्या के मसले पर दखल न दे सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 3 अक्टूबर तक टल गई है। आज सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की जिसके बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने 3 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करने का समय दिया। चीफ जस्टिस ने कहा कि पहले वे यह देखेंगे कि ये याचिकाएं कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आती हैं कि नहीं।सुनवाई के दौरान आज केंद्र सरकार ने कहा कि वे आज ही अपना जवाब दाखिल कर देंगे।

केंद्र ने कहा कि अभी हम कुछ भी नहीं कहना चाहते हैं। रोहिंग्या मुसलमानों का देश में आना 2012 में शुरु हुआ था। केंद्र ने कहा कि ये सरकार का कार्यकारी फैसला है और सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। वहीं याचिकाकर्ता ने कहा कि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी एक पक्षकार बनाया जाना चाहिए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया । कोर्ट ने कहा कि पहले हम यह देखेंगे कि हस्तक्षेप करने का हमें क्षेत्राधिकार है कि नहीं और अगर हम हस्तक्षेप कर सकते हैं तो कितना।वरिष्ठ वकील फाली एस नरीमन ने कहा कि कुछ भी गलत होगा तो हम आपके पास आएंगे । इसके बाद चीफ जस्टिस ने कहा कि आपको किसने रोका है ।पिछले 14 सितंबर को केंद्र सरकार ने प्रतिवादियों के वकीलों को अपूर्ण हलफनामा भेज दिया था।

लेकिन बाद में केंद्र सरकार के वकीलों ने सभी प्रतिवादियों को कहा कि ये अपूर्ण हलफनामा है इसलिए इसे तामिल न समझा जाए। उस अपूर्ण हलफनामे में कहा गया था कि रोहिंग्या मुसलमान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। वे भारत में शरणार्थी की तरह नहीं रह सकते हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि उन्हें वापस भेजे जाने का फैसला सही है।पिछले 11 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई आज तक के लिए टाल दी थी।

पिछले 4 सितंबर को दो रोहिंग्या मुसलमानों की तरफ से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था और एक सप्ताह में जवाब देने का निर्देश दिया था। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि वो ये फैसला करेगी कि रोहिंग्या मुसलमान भारत में शरणार्थी का दर्जा पाने के हकदार हैं कि नहीं। याचिकाकर्ता दो शरणार्थियों ने दायर किया है।

याचिका में न्यूज़ एजेंसी रायटर के 14 अगस्त के एक खबर को बनाया गया है जिसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को रोहिंग्या मुसलमानों समेत अवैध आप्रवासियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने का निर्देश दिया है। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ बौद्ध बहुल म्यामांर में कई मुकदमे लंबित हैं। बताया जा रहा है कि भारत में करीब चालीस हजार रोहिंग्या मुसलमानों ने शरण ले रखी है।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार का इन शरणार्थियों को वापस भेजने का फैसला संविधान की धारा 14, 21 और51(सी) का उल्लंघन है। उनको वापस भेजना अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी कानूनों का उल्लंघन है। अंतर्राष्ट्रीय कानून इन शरणार्थियों की सुरक्षा की गारंटी देता है। याचिका में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की 2016 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि म्यामांर के अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों के जीने की स्वतंत्रता का हनन हो रहा है।

याचिका में मांग की गई है कि कोर्ट सरकार को रोहिंग्या मुसलमानों को जबरन वापस भेजने से रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करे और उन्हें जिंदा रहने के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी जाए।इस याचिका के बाद 8 सितंबर को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के नेता गोविंदाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रोहिंग्यामुसलमानों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की मांग करने वाली एक याचिका दायर की है। अपनी याचिका में उन्होंने वकील प्रशांत भूषण द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने की अर्जी का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमान देश के संसाधनों पर बोझ हैं और देश की सुरक्षा के लिए खतरा भी।

जम्मू-कश्मीर के कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार के फैसले का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि वे आतंकी नहीं हैं| वे शरण लेने के लिए यहां आए हैं। तीन वकीलों ने भी भारत सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

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