आप को झटका, 20 विधायकों की सदस्यता गयी

नयी दिल्ली: दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) को आज उस समय करारा झटका लगा जब राष्ट्रपति ने लाभ के पद मामले में उसके 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर अपनी मुहर लगा दी। सत्तर सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में अब आप के विधायकों की संख्या 66 से घटकर 46 रह गयी है, हालाँकि इस निर्णय से पार्टी के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ा है। इस निर्णय से दिल्ली में इन सीटों पर उप चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया है। विधि एवं न्याय मंत्रालय की आज जारी अधिसूचना में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लाभ के पद मामले में फँसे इन विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की निर्वाचन आयोग की सिफारिश को स्वीकार करते हुए कहा है, “निर्वाचन आयोग द्वारा व्यक्त की गयी राय को ध्यान में रखते हुए और मामले पर विचार करते हुए मैं दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 की धारा 15 की उपधारा 4 के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए एतद्द्वारा अभिनिर्धारित करता हूं कि दिल्ली विधानसभा के 20 सदस्य उक्त विधानसभा के सदस्य होने से अयोग्य हो गये हैं।

” निर्वाचन आयोग पिछले दो साल से भी ज्यादा समय से इन विधायकों को लाभ के पद पर नियुक्त किये जाने की शिकायत की सुनवाई कर रहा था। आयोग ने इस साल 19 जनवरी को इन्हें विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य घोषित करने का निर्णय लिया था और इस आशय की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी थी। अयोग्य घोषित किये गये विधायकों में जंगपुरा से प्रवीण कुमार, नरेला से शरद कुमार चौहान, द्वारका से आदर्श शास्त्री, कस्तुरबा नगर से मदन लाल, मोती नगर से शिव चरण गोयल, बुराड़ी से संजीव झा, रोहताश नगर से सरिता सिंह, महरौली से नरेश यादव, वजीरपुर से राजेश गुप्ता, जनकपुरी से राजेष ऋषि, गाँधी नगर से अनिल कुमार वाजपेई, सदर बाजार से सोम दत्त, कालकाजी से अवतार सिंह कालरा, राजेन्द्र नगर से विजेन्द्र गर्ग, नजफगढ़ से कैलाश गहलोत, चांदनी चौक से अल्का लांबा, कोंडली से मनोज कुमार, लक्ष्मी नगर से नितिन त्यागी, मुंडका से सुखबीर सिंह दलाल और तिलक नगर से जरनैल सिंह शामिल हैं। राजौरी गार्डन से तत्कालीन विधायक जरनैल सिंह के खिलाफ भी लाभ के पद पर नियुक्ति की शिकायत थी, लेकिन उन्होंने 17 जनवरी 2017 को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और इस सीट पर पिछले साल अप्रैल में उप चुनाव भी हो चुका है। इसलिए, उन्हें अयोग्य रिपीट अयोग्य घोषित करने का मामला नहीं बनता।

आप सरकार ने 13 मार्च 2015 को 21 विधायकों को विभिन्न मंत्रालयों में संसदीय सचिव नियुक्त किया था। सरकार के इस फैसले के खिलाफ वकील प्रशांत पटेल ने 19 जून 2015 को राष्ट्रपति के समक्ष याचिका दायर की थी। दिल्ली सरकार ने अपने विधायकों की नियुक्ति को उचित ठहराने के लिए 24 जून 2015 को ‘दिल्ली असेंबली (रिमूवल ऑफ डिस्क्वॉलिफिकेशन) एक्ट-1997’ में संशोधन से संबंधित विधेयक विधानसभा में पारित किया था और इस निर्णय को पूर्व प्रभाव से लागू किया गया था। विधेयक का मकसद संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से अलग करना था, लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इसे नामंजूर कर दिया था। राष्ट्रपति ने 10 नवम्बर 2015 को लाभ के पद से संबंधित मामले को निर्वाचन आयोग के पास भेज दिया था। आयोग ने दो वर्ष से भी अधिक समय तक मामले की जांच के बाद गत शुक्रवार को इन विधायकों को अयोग्य घोषित करने का निर्णय लिया और इस बारे में अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी।

आम आदमी पार्टी की सरकार ने इसके खिलाफ उसी दिन दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था हालाकि न्यायालय ने सरकार को अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि इन विधायकों ने चुनाव आयोग की सुनवाई में सहयोग नहीं किया। न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए सोमवार की तारीख मुकर्रर की हुई है। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता से पूछा था “आखिर आप चुनाव आयोग के संपर्क में क्यों नहीं रहे? जब आप बुलाने पर भी नहीं गये, तो अब आयोग मामले पर फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है।

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